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CBAM: भारतीय निर्यातकों पर प्रभाव

इस लेख में आप पढ़ेंगे: CBAM: भारतीय निर्यातकों पर प्रभाव UPSC

1 जनवरी को यूरोपीय संघ ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के तहत दुनिया का पहला कार्बन टैक्स लागू करना शुरू कर दिया है, जिससे भारत सहित विकासशील दुनिया के कई देशों के निर्यात पर प्रभाव पड़ेगा। यूरोप में 2023 में लाया गया कार्बन बॉर्डर टैक्स, यूरोपीय संघ की तुलना में कम सख्त जलवायु नियमों वाले देश में निर्मित उत्पादों पर लगाया जाने वाला आयात शुल्क है। इसका घोषित उद्देश्य ‘कार्बन रिसाव’ को रोकना है, लेकिन यह टैक्स भारत जैसे देशों में निर्मित स्टील या सीमेंट जैसी वस्तुओं को यूरोपीय बाजारों में महंगा और कम प्रतिस्पर्धी बना देता है। यूरोपीय संघ के आयातकों को आयात करने के लिए CBAM प्रमाणपत्र की आवश्यकता होगी।

अपने वर्तमान स्वरूप में, CBAM विद्युत क्षेत्र और ऊर्जा-गहन औद्योगिक क्षेत्रों, जैसे सीमेंट, इस्पात, एल्युमीनियम, तेल शोधन, कागज, कांच, रसायन और उर्वरक क्षेत्र से आयातित वस्तुओं पर कार्बन-संबंधी शुल्क लागू करेगा। हालांकि, इसमें यूरोपीय संघ के पास सूची का विस्तार करने का प्रावधान भी है।

भारत मुख्य रूप से यूरोपीय संघ को एल्युमीनियम, लोहा और इस्पात का निर्यात करता है, जिन पर इस नियमन के कारण प्रभाव पड़ने की आशंका है।

भारत पर प्रभाव

1. निर्यात-आधारित विकास में अड़चन: संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) ने चेतावनी दी है कि कार्बन कर (CBAM) के लागू होने से गरीब देशों के विकास पर असर पड़ सकता है और निर्यात-आधारित विकास के उनके अवसरों में कमी आ सकती है, खासकर अगर हरित उत्पादन प्रक्रियाओं वाले विकसित देशों को CBAM से छूट दी जाती है।

2. CBDR का उल्लंघन: विकसित देशों का तर्क है कि CBAM का उद्देश्य केवल यूरोपीय संघ द्वारा घरेलू उद्योग पर लागू किए गए समान मानकों को शेष विश्व पर लागू करना है, जबकि विकासशील देशों का कहना है कि यह साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों (Common but differentiated responsibilities/ CBDR) का उल्लंघन करता है – जो विश्व व्यापार संगठन द्वारा मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण कानून का एक प्रमुख सिद्धांत हैCBDR के अनुसार, यद्यपि सभी देश वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए ज़िम्मेदार हैं, फिर भी उनके दायित्व और नीतिगत गुंजाइश उनके विकास के स्तर, पर्यावरण क्षरण में उनके ऐतिहासिक योगदान और क्षमता के अनुसार भिन्न हो सकते हैं

3. तकनीकी अंतर: ब्लास्ट फर्नेस (Blast Furnace) बनाम आर्क फर्नेस (Arc Furnace)

भारतीय निर्यातकों ने CBAM के अनुपालन हेतु सरकार से सहायता मांगी है। इसके तहत आर्क फर्नेस (electric arc furnace) का उपयोग अनिवार्य होगा, जो भारत में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली ब्लास्ट फर्नेस (blast furnace) की तुलना में स्टील स्क्रैप (steel scrap) का उपयोग करके लौह उत्पादन की एक स्वच्छ विधि है।

इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) कम उत्सर्जन वाली लचीली इस्पात निर्माण प्रक्रिया है जो बिजली और स्क्रैप (रद्दी लौह उत्पाद) का उपयोग करती हैं। वहीँ ब्लास्ट फर्नेस (BF) बड़े पैमाने पर निरंतर उत्पादन के लिए कोक और लौह अयस्क (iron ore) का उपयोग करती हैं, लेकिन इनकी पूंजी और कार्बन लागत अधिक होती है। BF जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर करती हैं, जिसके विपरीत टिकाऊ और ग्रीन इस्पात उत्पादन के लिए EAF भविष्य की तकनीक बन जाती हैं।

इस्पात उत्पादन में, ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस मार्गों से कार्बन उत्सर्जन सबसे अधिक होता है, गैस-आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) मार्गों से कम और स्क्रैप-आधारित इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) मार्गों से सबसे कम उत्सर्जन होता है। भारतीय निर्माता अधिकतर ब्लास्ट फर्नेस मार्ग का उपयोग करते हैं, और निर्यातकों ने वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को सूचित किया है कि यूरोपीय संघ घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ावा देने के लिए इस्पात स्क्रैप के निर्यात को विनियमित कर रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ इस्पात स्क्रैप के सबसे बड़े उत्पादक हैं। अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन भी आर्क फर्नेस का प्रमुखता से उपयोग करते हैं, जिससे CBAM के लागू होने के बाद इस क्षेत्र में इस्पात उत्पादन को लाभ होगा और भारतीय निर्माताओं को नुकसान हो सकता है।

4. MSME पर आर्थिक प्रभाव: 1 जनवरी 2026 से, यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाले भारतीय इस्पात और एल्यूमीनियम के प्रत्येक शिपमेंट पर कार्बन लागत लगेगी और कई भारतीय निर्यातकों को “कीमतों में 15-22 प्रतिशत की कटौती करनी पड़ सकती है ताकि यूरोपीय संघ के आयातक उस मार्जिन का उपयोग सीबीएएम कर का भुगतान करने के लिए कर सकें”।

MSMEs को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगाCBAM की जटिल डेटा और सत्यापन आवश्यकताओं के कारण अनुपालन लागत में भारी वृद्धि होगी, जिससे कई छोटे निर्यातक यूरोपीय संघ के बाजार से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे। एक गंभीर चुनौती यह है कि बड़े उत्पादक अक्सर अपने संयंत्र स्तर के उत्सर्जन डेटा (emission data) को उन लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के साथ साझा नहीं करते हैं जो उनसे इस्पात या एल्यूमीनियम खरीदते हैं। परिणामस्वरूप, MSME के पास CBAM के तहत आवश्यक सत्यापित कार्बन जानकारी का अभाव होता है। ऐसे मामलों में, यूरोपीय संघ के अधिकारी वास्तविक उत्सर्जन के बजाय डिफ़ॉल्ट उत्सर्जन मूल्यों (आमतौर पर उच्चतम मानदंड) को लागू कर सकते हैं, जिससे वास्तविक उत्सर्जन कम होने पर भी कार्बन लागत में भारी वृद्धि हो जाती है।

5. पर्यावरण संरक्षण का मुखौटा: CBAM पर्यावरण संरक्षण से कहीं अधिक विकसित देशों के व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देने से संबंधित है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) द्वारा 2021 में जारी एक अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया था कि यूरोपीय संघ का विवादास्पद कार्बन कर वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को केवल 0.1 प्रतिशत तक कम करेगा, लेकिन विकासशील देशों के निर्यात में काफी बाधा उत्पन्न करेगा

इन्ही कारणों से, BRICS ने CBAM को एकतरफा और मनमाना बताते हुए इसकी निंदा की है। ऐसे में, पारस्परिक मान्यता समझौतों (Mutual Recognition Agreements) के माध्यम से एक भारतीय संस्था स्थापित करना आवश्यक है जो कार्बन उत्सर्जन प्रमाणन दे सकेगी और जिसके प्रमाणन को यूरोपीय संघ द्वारा मान्यता प्राप्त हो।

Source: Indian Express