इस लेख में आप पढ़ेंगे: अमेरिका की नई विश्व व्यवस्था – U.S. National Security Strategy (NSS) – UPSC
आठ दशक पहले अर्थात दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात एक ‘नियम -आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (Rules-based International Order) की नीव पड़ी थी, जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र ,विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और नेटो जैसी संस्थाएँ वजूद में आई। इस ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था‘ में देशों ने आपसी ज़िम्मेदारियों और साझा बोझ उठाने की प्रतिबद्धता जताई, ताकि लोकतांत्रिक दुनिया को शत्रुतापूर्ण अधिनायकवादी ताक़तों से बचाया जा सके।
लेकिन दिसंबर 2025 में प्रकाशित नई अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy) यह संकेत देती है कि अब अमेरिका के लिए नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का कोई मतलब नहीं है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने फरवरी 2025 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के दौरान अपने यूरोपीय सहयोगियों को पहले ही चेतावनी दे दी थी कि यह बदलाव आने वाला है।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
- अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, ख़ास तौर पर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका-विरोधी भावना से प्रभावित हैं। अमेरिका के अनुसार इन संस्थाओ ने उसके हित में कोई काम नहीं किया है।
- जब दूसरे विश्व युद्ध के बाद तथाकथित नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाई गई थी, तब चीन कोई बड़ी चिंता नहीं था, लेकिन आज चीन एक चुनौती बन कर उभरा है।
- नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के कारण अमेरिका की संप्रभुता कमजोर पड़ी है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों के दखलअंदाज़ी के कारण उसकी संप्रभुता प्रभावित हुए है।
- आज के परिवेश में अमेरिका के लिए किसी भी बहुधुर्वीय व्यवस्था को स्वीकार करना सम्भव नहीं है।
नई विश्व व्यवस्था की दिशा में अमेरिका के बढ़ते कदम
- मोनरो सिद्धांत की वापसी -1823 के मोनरो सिद्धांत के अन्तर्गत अमेरिका की पश्चिमी गोलार्ध में सर्वोच्चता का वादा किया गया था। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy) दावा करती है कि संयुक्त राज्य अमेरिका को पश्चिमी गोलार्ध में सर्वोच्च शक्ति बने रहने का अधिकार है, इसी कारण वेनेज़ुएला ,कोलंबिया, पनामा और क्यूबा अमेरिका के रडार पर हैं। इस क्षेत्र में वह चीन के दखल को स्वीकार नहीं करेगा। आज चीन लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और वहां बुनियादी ढांचे का प्रमुख निवेशक है। NSS का लक्ष्य है कि अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में चीन का असर कम किया जाए।
- अमेरिका अब शायद यूरोप के लिए भरोसेमंद सहयोगी नहीं रहा। EU एक महाशक्ति नहीं बन सकता, न ही इसके किसी सदस्य देश में महाशक्ति बनने का मादा है। अमेरिका वर्षों से यूरोप पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डालता रहा है। अमेरिका नही चाहता नाटो का सारा भार वह अपने कंधो पर उठाये। ब्रेग्ज़िट के बाद से यूरोपीय संघ की धारणा कमजोर पड़ रही है। अमेरिका खुद चाहता है यूरोपीय संघ को समाप्त कर देना चाहिए और देशों को संप्रभुता लौटा देनी चाहिए।
- अमेरिका टैरिफ नीति साफ संकेत है की दुनिया के देशो को उसके इशारो पर ही चलना होगा। वह बहुधुर्वीय व्यवस्था के सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं करेगाअमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) में साफ़ दिखता है कि अमेरिका की घरेलू राजनीति में चल रहा सांस्कृतिक संघर्ष अब कुछ हद तक विदेश नीति को भी प्रभावित कर रहा है, और उसके ज़रिए पश्चिमी दुनिया की सुरक्षा पर असर डाल रहा है। रूस को इसमें शत्रु शक्ति के तौर पर नहीं दर्ज किया गया है, जबकि उसने पश्चिम के सहयोगी यूक्रेन पर हमला किया है। अमेरिका और यूरोप को रक्षा प्रतिबद्धता दीवार अब धीरे -धीरे दरक रही है।
- गाज़ा के लिए अमेरिका के नेतृत्व में जिस ‘बोर्ड ऑफ़ पीस‘ का गठन किया गया है वह एक नए अंतरराष्ट्रीय शांति संगठन के तौर पर काम करेगा। हो सकता है कि आने वाले समय में इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विकल्प के तौर पर पेश कर दिया जाये।
- ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका ट्रांसअटलांटिक रिश्तों की भी बलि लेने के लिए तैयार है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाया जाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी मानते है। अमेरिकी ने इस योजना का विरोध करने पर यूरोप के आठ देशो डेनमार्क, फ़िनलैंड, फ़्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन पर 10 फ़ीसदी टैरिफ़ की घोषणा कर दी है।

