इस लेख में आप पढ़ेंगे: चर्चिल दुनिया के लिए हीरो और भारत के लिए विलेन क्यों/ Churchill
ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल को दूसरे महायुद्ध में हिटलर जैसे शक्तिशाली तानाशाह को हराने वाले नेता के तोर पर देखा जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ब्रिटेन में वो एक कद्दावर नेता के रूप में देखे जाते हैं, लेकिन ब्रिटेन के उपनिवेशवादी इतिहास में उनके शासन काल से एक काला अध्याय भी जुड़ा है जिसका सीधा संबंध भारत से है।
भारत की जनता और देश के अधिकतर इतिहासकार चर्चिल को 1943 में बंगाल में भूख से हुई लाखों मौतों का ज़िम्मेदार मानते हैं। इस अकाल में एक अनुमान के मुताबिक़, अन्न न मिलने की वजह से 30 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और ज़्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि ऐसा चर्चिल की नीतियों के कारण हुआ था। बंगाल का भयंकर अकाल एक ‘ख़ामोश प्रलय’ था जिसके ज़िम्मेदार पूर्णत चर्चिल थे। जब वायसराय वेवेल ने अकाल पीड़ित ज़िलों को और अनाज भेजने की मांग की तो चर्चिल ने जान-बूझकर अनाज को भुखमरी झेल रहे बंगाल से हटा कर विश्व युद्ध में लड़ रहे अंग्रेज़ सिपाहियों के लिए भेजने का फ़ैसला किया। भारत का अपना अतिरिक्त अनाज सीलोन (श्रीलंका) भेज दिया गया। चर्चिल सरकार ने ऑस्ट्रेलिया से आए गेहूं से भरे जहाज़ भारतीय बंदरगाहों पर न रोककर मध्य-पूर्व की तरफ़ भेज दिए। अमेरिका और कनाडा ने भारत को खाद्य मदद भेजने की पेशकश की लेकिन उसे भी चर्चिल ने नामंज़ूर कर दिया। सोनिया पर्नेल ने ‘फर्स्ट लेडी, द लाइफ एंड वर्क्स ऑफ़ क्लेमेंटाइन चर्चिल’ नामक पुस्तक में लिखा है कि चर्चिल की ज़िम्मेदारियाँ अनेक थीं क्योंकि उस समय द्वितीय विश्व युद्ध जारी था और युद्ध की आपात स्थिति और अपने समय की अन्य सभी ज़िम्मेदारियों से वो निपटने की एक साथ कोशिश कर रहे थे।
बर्मा से जापानियों के घुसपैठ के ख़तरे को देखते हुए ‘नज़रअंदाज़ करने की नीति’ अपनाई गई थी। इसके पीछे सोच यह थी कि फ़सल समेत सभी चीज़ों को ख़त्म कर दिया जाए। यहाँ तक कि जो नावें फ़सलों को ले जाने में इस्तेमाल होती हैं, उन्हें भी बर्बाद कर दिया जाए ताकि जापानी जब आएं तो उनके पास आगे बढ़ने के लिए कोई भी संसाधन ना हो। इसकी नीति का असर यह हुआ कि अकाल और विकराल रूप में सामने आया। दरसल उन्हें अकाल के लिए किसी भी तरह से दोषी तो नहीं ठहराया जा सकता लेकिन हम कह सकते हैं कि सक्षम होने के बावजूद उन्होंने राहत पहुँचाने की कोशिश नहीं की और उन्होंने गोरों की ज़िंदगी को दक्षिण एशियाई लोगों की ज़िंदगी के ऊपर तरजीह दी। यह वाकई में अन्यायपूर्ण था क्योंकि उस वक़्त लाखों भारतीय सैनिक दूसरे विश्व युद्ध में लड़ रहे थे।

