पृथ्वी का बिगड़ता ऊर्जा संतुलन और उसके प्रभाव – UPSC

पृथ्वी का बिगड़ता ऊर्जा संतुलन और उसके प्रभाव – UPSC

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इस लेख में आप पढ़ेंगे : पृथ्वी का बिगड़ता ऊर्जा संतुलन और उसके प्रभाव – UPSC

ऊष्मा बजट क्या है ?

सूर्य हमारी पृथ्वी के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है। पृथ्वी एक निश्चित मात्रा में लघु तरंगों के रूप में सूर्य से ऊष्मा प्राप्त करती हैं और फिर विकिरण के रूप में दीर्घ तरंगों के माध्यम से अतिरिक्त ऊष्मा को पुनः परावर्तित कर देती है। इस तरह से लगातार ऊष्मा का यह प्रवाह बना रहता है, जो पृथ्वी के तापमान को भी संतुलित रखता है। इसी प्रक्रिया को ही पृथ्वी का ऊष्मा बजट कहते हैं। हाल के ही शोध से जानकारी मिली है कि पृथ्वी जितनी ऊर्जा 2005 में मुक्त करती थी 2019 में वो उसकी आधी ऊष्मा छोड़ रही है जिसका मतलब है कि वो पहले के मुकाबले दोगुनी ज्यादा ऊष्मा जमा कर रही है

पृथ्वी के ऊर्जा बजट में यह असंतुलन क्यों आ रहा है?

शोधकर्ताओं के अनुसार ऐसा वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसों की मात्रा बढ़ने के कारण हो रहा है। वातावरण में जिनकी मात्रा मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ रही है। ये गैसें सूर्य से आने वाले अवरक्त किरणों के तरंग दैर्ध्य को परिवर्तित कर देती है जिस से वे वातावरण में वापस परावर्तित नहीं हो पाती इससे पृथ्वी के तापमान में निरंतर वृद्धि होती रहती है। शोध के मुताबिक जल वाष्प में होती वृद्धि और बादलों और समुद्री बर्फ में आने वाली कमी भी इसकी एक वजह है।

तापमान में होने वाले इस वृद्धि के निम्न प्रभाव देखे जा सकते है –

  • पृथ्वी पर जमा इस अतिरिक्त ऊर्जा के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है। इसका 90 फीसदी हिस्सा महासागरों को गर्म कर रहा है जबकि शेष भूमि और हवा में गर्मी को और बढ़ा रहा है जिसके कारण ग्लेशियर में जमा बर्फ पिघल रही है। शोध के अनुसार यदि आने वाले वर्षों में तापमान बढ़ने की गति कम नहीं हुई तो उसकी वजह से जलवायु में कुछ बड़े बदलाव आ सकते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण पहाड़ों की बर्फ अधिक तेजी से पिघल रही है और ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, इससे एशिया में पानी की आपूर्ति गंभीर गंभीर रूप से प्रभावित होगी। इससे करीब 1 अरब आबादी प्रभावित हो सकती है जो हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं से बहने वाली नदियों पर निर्भर हैं।
  • ग्लोबल वार्मिंग के कारण उष्णकटिबंधीय इलाको में बाढ़ का खतरा करीब 50 गुना अधिक बढ़ जायेगा निचले तटीय क्षेत्र या समुद्र के किनारे वाले इलाकों में दुनिया की लगभग 10 फीसदी आबादी रहती है। इन इलाकों में कटाव और बढ़ते समुद्र स्तर के अलावा, इनके अनूठे पारिस्थितिक तंत्र को विनाशकारी खतरों का सामना करना पड़ रहा है। जिसमें जल स्तर में बेहताशा वृद्धि के चलते प्राकृतिक, कृत्रिम सुरक्षा को तोड़ते हुए समय-समय पर आने वाली बाढ़ शामिल है। जैसा कि 2005 में अमेरिका में तूफान कैटरीना आने की वजह से हुआ था। 2013 में एशिया में टाइफून हैयान जो कि अब तक का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय चक्रवात था।
  • बढ़ते तापमान के चलते दुनिया की ताजे पानी की झीलों में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से घट रहा है। ऑक्सीजन महासागरों की तुलना में झीलों से बहुत तेजी से कम हो रही है। जलवायु परिवर्तन की वजह से ताजे पानी (फ्रेश वाटर) की जैव विविधता अर्थात इसमें रहने वाले जीवों और पीने के पानी की गुणवत्ता दोनों को खतरा है। शोध में पाया गया कि समशीतोष्ण क्षेत्र में सर्वेक्षण में शामिल की गई झीलों में ऑक्सीजन का स्तर 1980 के बाद से सतह पर 5.5 फीसदी और गहरे पानी में 18.6 फीसदी तक गिर गया है।
  • 1991 से 2018 के बीच दुनिया भर में गर्मीं के कारण हुई करीब 37 फीसदी मौतों के लिए वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि जिम्मेवार थी। गर्मी के कारण सबसे ज्यादा मौतें दक्षिण अमेरिका के इक्वाडोर और कोलंबिया में रिकॉर्ड की गई थी। इसके अलावा दक्षिण-पश्चिम एशिया में ईरान और कुवैत, पूर्वी एशिया में फिलीपींस और थाईलैंड जैसे देशों में गर्मी के कारण होने वाली 50 फीसदी से ज्यादा मौतों के लिए तापमान में हो रही वृद्धि जिम्मेवार थी।
  • हाल के दशकों में, किंघाई तिब्बत के पठार (क्यूटीपी) पर जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ते तापमान ने पर्माफ्रोस्ट की गर्मी को बढ़ा दिया है जिसके कारण पर्माफ्रोस्ट में गिरावट देखी जा रही है।
  • दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के चलते कृषि पर सबसे अधिक असर पड़ा है, बढ़ता तापमान उपज में कमी का प्रमुख कारण है। इसलिए, भविष्य में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के अनुसार ढालने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
  • जिन पर्वतों में हिमालय और उससे सटे पर्वतमाला शामिल हैं वे पृथ्वी पर सबसे ऊंचे हैं। इस क्षेत्र को तीसरा ध्रुव या एशियाई जल मीनार भी कहा जाता है क्योंकि इसमें ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे अधिक बर्फ है। बढ़ते तापमान और मानवीय हस्तक्षेपों के चलते क्षेत्र की जल स्थितियों की संवेदनशीलता पर तनाव बढ़ गया है जिससे बाढ़ के खतरे बढ़ गए हैं। हाल ही में उत्तराखंड में इस तरह की घटनाएं आपदा के रूप में देखि गयी है।
  • नए शोध से पता चला है कि अंटार्कटिका के बर्फ वाले हिस्से (आइस शेल्फ) का एक तिहाई से अधिक के समुद्र में गिरने का खतरा बढ़ गया है। अगर दुनिया भर में तापमान इसी तरह बढ़ता रहा और पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 4 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच जाए तो जल्द ही यह हिमखंड ढह कर समुद्र में मिल जाएगा।

कुल मिलाकर बढ़ते तापमान की गंभीरता को देखते हुए दुनिया भर के देशो के लिए जरुरी है कि पेरिस समझौते को व्यवहारिक धरातल पर लागू करने का हर संभव प्रयास करे अन्यथा बाढ़ और सूखे की प्राकृतिक आपदाओं से मानवीय त्रासदियां बार-बार देखने में आती रहेंगी। विकसित देशो को इस गंभीर मसले पर अपनी हठधर्मिता को दरकिनार करते हुए उत्तर-दक्षिण संवाद की धारणा को प्रोत्साहन देना होगा।

NOTE

पर्माफ्रोस्ट वह भूमि है जो लगातार दो या उससे अधिक वर्षों तक 0 डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे रहती है, जो भूमि पर या समुद्र के नीचे स्थित होती है। जरूरी नहीं कि पर्माफ्रोस्ट जमीन पर पहली परत हो। यह पृथ्वी की सतह के नीचे एक इंच से लेकर कई मील की गहराई तक हो सकता है।