यूक्रेन का राजनीतिक संकट (Ukrainian Crisis) – UPSC

यूक्रेन का राजनीतिक संकट (Ukrainian Crisis) – UPSC

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हाल ही में यूक्रेन की पूर्वी सीमा पर रुसी सैनिको की उपस्थिति पश्चिमी देशो और रूस के मध्य तनाव का कारण बनी हुई है , यूक्रेन के पूर्व में डोनेवास, डोनेतस्क और लुहांस्क अलगाववादियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है जिसे रूस का प्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त है।

दरअसल यूक्रेन का राजनीतिक संकट उसकी भूमि पर पश्चिमी देशो और रूस के टकराव की कहानी है, जो नवंबर 2013 में उस समय प्रारम्भ हुई , जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यनोकोविच ने यूरोपियन संघ के प्रस्तावित ‘लैंडमार्क ट्रेड डील’ को ठुकराते हुए रूस के 5 मिलियन डॉलर के बेलआउट पैकेज को स्वीकार कर लिया था।  इस मुद्दे को लेकर यूक्रेन का समाज भी दो खेमो में बंटा हुआ था- उत्तर पश्चिम के बहुसंख्यक रोमन कैथोलिक लोग यूरोपियन संघ के लैंडमार्क ट्रेड समझौते को स्वीकार करने के पक्ष में थे क्योकि इससे यूक्रेन के लोग बिना किसी वीजा के यूरोपियन संघ के देशो में आ-जा सकते थे, इस समझौते से यूरोपियन कम्पनिया यूक्रेन में व्यापक पैमाने पर निवेश करती तथा इससे देश के आर्थिक विकास को गति मिलती।  दूसरी ओर पूर्वी यूक्रेन में रुसी मूल के लोग यूरोपियन संघ के प्रस्तावित समझौते को पश्चिमी देशो के दखल के रूप में मानते थे।  रूस इस बात को स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं हो सकता की कोई पूर्व सोवियत गणराज्य पश्चिमी देशो का संरक्षण स्वीकार करे।  इससे पहले 2008 में जॉर्जिया के मुद्दे को लेकर रूस और पश्चिमी देशो में टकराव की स्थिति उत्त्पन्न हो चुकी है।

यूरोपियन संघ के लैंडमार्क ट्रेड समझौते के कारण न केवल विक्टर यानोकोविच को त्यागपत्र देना पड़ा था बल्कि इससे यूक्रेन में एक विद्रोह की स्थिति उत्त्पन्न हो गयी जिससे रूस को यूक्रेन में दखल देने का अवसर मिला। यूक्रेन में रूस के भू-राजनीतिक हित जुड़े है, लम्बे समय से क्रीमिया के सेवास्टोपोल में रूस का नौसैनिक बेडा सक्रिय है जिसके माध्यम से वह काला सागर क्षेत्र में अपना सामरिक हितो को बनाये रख सकता है। यदि यूक्रेन पश्चिमी देशो के संरक्षण को स्वीकार कर लेता तो निश्चित तौर पर काला सागर छेत्र में रूस के सामरिक हित प्रभावित होते अतः रूस अमेरिका व पश्चिमी देशो की अनदेखी करते हुए क्रीमिया को यूक्रेन से अलग कराने में सफल रहा।  तब से लेकर आज तक यूक्रेन का संकट रूस और पश्चिमी देशो के मध्य शीतयुद्ध का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।  यह सही है की पश्चिमी देश यूरोप के पूर्व सोवियत गणराज्यो को यूरोपीय सघ में सम्मिलित कराए में सफल रहे है और अब उनका प्रयास है की इन्हे NATO के सुरक्षा कवच में ही ले लिया जाये , परन्तु जिस प्रकार से रूस फिर से एक ताकत के रूप में उभरने के लिए प्रयासरत है ऐसे में पश्चिमी देशो के लिए पूर्व सोवियत गणराज्यो में दखल देना इतना आसान नहीं होगा। हाल ही में सीरिया के मुद्दे को लेकर रूस ने अमेरिका और पश्चिमी देशो को स्पष्ट सन्देश दिया है की अब उनकी मनमानी आसानी से चलने वाली नहीं है। अमेरिका की एकल धुर्वीय मानसिकता के विरुद्ध चीन और ईरान को लेकर रूस एक नया गठजोड़ कायम करने की दिशा में अग्रसर है। फ़िलहाल तो यूक्रेन को लेकर रूस और पश्चिमी देशो में हाइब्रिड वारफेयर की स्थिति बनी हुई है। 

क्रीमिया  

भौगोलिक दृष्टि से क्रीमिया यूक्रेन के दक्षिण में स्थित है वर्तमान में जिसकी जनसँख्या सिर्फ 23 लाख है। यहाँ की सामाजिक संरचना में 58% लोग रुसी मूल के, 24% लोग यूक्रेन मूल के जबकि 12% लोग तातारी मुस्लिम है।  किसी समय तातारी मुस्लिम क्रीमिया का बहुसंख्यक वर्ग था लेकिन दूसरे महायुद्ध के दौरान स्टालिन की नीतियों के चलते उन्हें क्रीमिया से पलायन करना पड़ा था।  सोवियत संघ के विघटन के बाद जैसे ही यूक्रेन स्वतंत्र हुआ तातारी मुस्लिमो ने फिर से क्रीमिया में बसना शुरू कर दिया था।  ऐसे में जमीनी हक़ को लेकर रुसी बहुसंख्यको और तातारी मुस्लिमो के मध्य तनाव भी उत्पन होता रहा है।

क्रीमिया कानूनी रूप से यूक्रेन का एक स्वायत्त प्रांत था जिसका अपना संविधान और अपनी संसद थी। क्रीमिया को लेकर रूस और यूक्रेन के मध्य 1994 में एक समझौता हुआ था जिसमे अमेरिका, ब्रिटैन और फ्रांस भी सम्मिलित थे और 2014 में यह यूक्रेन से स्वतंत्र हो चूका है।