इस लेख में आप पढ़ेंगे: क्या ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में भारत को शामिल होना चाहिए ? Board of Peace UPSC
गाज़ा में इसराइल और हमास के बीच संघर्षविराम को स्थायी रूप से लागु करने और फ़लस्तीनी क्षेत्र में एक अंतरिम सरकार की निगरानी करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा ‘बोर्ड ऑफ पीस‘ (Board of Peace) की औपचारिक शुरुआत की है, जिसमे भारत को भी शामिल होने का निमंत्रण मिला है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि भारत इसे स्वीकार करेगा या नहीं।
भारत को Board of Peace में क्यों शामिल नहीं होना चाहिए ?
- भारत मल्टिपोलर वर्ल्ड यानी बहुध्रुवीय दुनिया की बात करता है, जहाँ उसकी भी अपनी एक हैसियत हो। जबकि Board of Peace यूनिपोलर वर्ल्ड यानी अमेरिका के दबदबे वाली व्यवस्था को ही मज़बूत करेगा।
- हाल ही में अमेरिका ने 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने का फ़ैसला किया है। यहाँ तक कि वह पश्चिमी देशों के सैन्य गठजोड़ नेटो को भी ख़ारिज कर रहा है। ऐसे में अमेरिकी वर्चस्व वाले संगठन में शामिल होने का क्या औचित्य हो सकता है?
- बोर्ड की स्थापना ऐसे समय में हुई है, जब ट्रंप अमेरिकी विदेश नीति के एक साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें अमेरिका सरकारों को गिरा सकता है, विदेशी क्षेत्रों और संसाधनों पर कब्ज़ा कर सकता है और पड़ोसी देशों पर “उनकी इच्छा के ख़िलाफ़” भी प्रभुत्व जमा सकता है।
- बोर्ड ऑफ पीस एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय संगठन से बिल्कुल अलग होगा। इसके चार्टर में संगठन के अध्यक्ष ट्रंप को असाधारण अधिकार दिए गए हैं, जिनमें फै़सलों को वीटो करने, एजेंडा तय करने, सदस्यों को आमंत्रित करने और हटाने, पूरे बोर्ड को भंग करने और अपने उत्तराधिकारी को नामित करने की शक्ति शामिल है। बाकि सदस्यो की वहाँ कोई हैसियत नही होगी।
- ट्रंप का ‘Board of Peace’ पिछले साल नवंबर में पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 से काफ़ी अलग है। UNSC के प्रस्ताव में इसकी समय सीमा 31 दिसंबर 2027 तक रखी गई थी। इसके अलावा यूएनएससी को हर छह महीने में रिपोर्टिंग अनिवार्य की थी, लेकिन ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की कोई समय सीमा नहीं है। इसका इस्तेमाल गाज़ा से बाहर भी हो सकता है। कई लोग BOP को संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में देखने लगे हैं।
भारत को Board of Peace में शामिल क्यों होना चाहिए?
- भारत की भागीदारी ग्लोबल साउथ की चिंताओं को कमज़ोर करने के बजाय उन्हें और मज़बूत करेगी।
- अगर ट्रंप कश्मीर विवाद को भी उन शांति योजनाओं में शामिल करने का फ़ैसला करते हैं, जिन्हें बोर्ड ऑफ पीस सुलझाने की कोशिश करेगा तो भारत के लिए समस्या खड़ी हो सकती है, जबकि पाकिस्तान इसमें शामिल है।
- ट्रंप के निमंत्रण को ठुकराने से उसकी नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है,जबकि अमेरिका-भारत संबंधों में पहले ही दरार देखि जा रही है। व्यापार वार्ताओं की नाज़ुक स्थिति भी इस स्तर पर ट्रंप के निमंत्रण को ठुकराने से बचने की एक वजह हो सकती है।
Board of Peace से जुड़े कई सवाल हैं। भारत इसमें जल्दीबाज़ी में शामिल नहीं हो सकता है। किन शर्तों पर सदस्य देश इसके चार्टर से बंधे होंगे? इसकी व्याख्या का अधिकार किसके पास होगा? BOP के कार्यकारी बोर्ड के सदस्यों में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर, अमेरिका के डेप्युटी रक्षा सलाहकार रॉबर्ट गेब्रियल, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन और वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा हैं। ये सारे अमेरिकी नागरिक हैं या ट्रंप के वफ़ादार माने जाते हैं। इस समय तो यह सार्वजनिक अंतरराष्ट्रीय संस्था की बजाय निजी क्लब जैसा प्रतीत होता है।

