ब्रिक्स (BRICS) का विस्तार और बदलते भू -राजनितिक समीकरण – UPSC
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ब्रिक्स (BRICS) का विस्तार और बदलते भू -राजनितिक समीकरण – UPSC

इस लेख में आप पढ़ेंगे: ब्रिक्स (BRICS) का विस्तार और बदलते भू -राजनितिक समीकरण – UPSC

हाल ही में जोहानिसबर्ग (Johannesburg, South Africa) में आयोजित ब्रिक्स शिखर बैठक में सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना, इथियोपिया और मिस्र को नए सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। लगभग 40 देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता लेने में दिलचस्पी दिखाई है। सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, बोलीविया समेत 23 देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता के लिए औपचारिक तौर पर आवेदन पहले ही कर दिया था। भारत की ओर से पहली बार ब्रिक्स के सदस्य देशों की सदस्यता बढ़ाने पर सहमति का एलान किया गया। इससे पहले भारत और ब्राजील ब्रिक्स में सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने के लिए राज़ी नहीं थे। ऐसा लगता है कि नए सदस्यों को शामिल करने के मामले में चीन की छाप है, जो रूस के समर्थन से ब्रिक्स को आक्रामक तरीके से विस्तार दे रहा है।

ब्रिक्स की सदस्यता लिए इतनी मारामारी क्यों ?

  • जो देश ब्रिक्स की सदस्यता लेना चाहते हैं वे इसे डब्ल्यूटीओ, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और यूएन जैसे पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले संगठन के विकल्प के तौर पर देखते हैं।
  • कई देश पश्चिमी वित्तीय और सहायता एजेंसियों की कड़ी शर्तों से परेशान हैं। लिहाजा वे ब्रिक्स देशों के न्यू डेवलपमेंट बैंक की मदद चाहते।
  • ग्लोबल साउथ (Global South) के देशों को लगता है यहां उनकी ज्यादा सुनी जाएगी। उन्हें दूसरे सदस्य देशों के साथ मिल कर कारोबार, वित्तीय मदद और निवेश हासिल करने के ज्यादा मौका मिलेगा।
  • मौजूदा विश्व व्यवस्था से इन देशों को सबसे ज्यादा निराशा कोविड महामारी के वक्त हुई थी, जब पश्चिमी धनी देशों ने जीवनरक्षक दवाओं की जमाखोरी (hoarding) शुरू कर दी थी।
  • कुछ देश अमेरिकी विदेश नीति के प्रभाव को कम करना चाहते हैं।
  • कुछ देशो के लिए आईएमएफ का कर्जा दमघोंटू है। ब्रिक्स बैंक इन देशों को आसान शर्तों पर कर्ज दे सकता है ताकि उनकी अर्थव्यवस्था रफ़्तार पकड़ सके।
  • अफ्रीका की सबसे तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था इथियोपिया (Ethiopia) को उम्मीद है कि ब्रिक्स में शामिल होने से उसके हित ज्यादा सुरक्षित रहेंगे। बोलीविया डॉलर पर निर्भरता खत्म करना चाहता है। उसका इरादा युआन (Chinese currency Yuan) में कारोबार बढ़ाना है जबकि तेल और गैस संसाधनों से लैस अल्जीरिया (Algeria) न्यू डेवलपमेंट बैंक (इसे ब्रिक्स बैंक भी कहा जाता है) का सदस्य बनना चाहता है।

आखिर चीन क्यों चाहता है ब्रिक्स का विस्तार

  • चीन और रूस ब्रिक्स के जरिए जी-7 देशों और अमेरिकी विश्व व्यवस्था (world order) को तोड़ना चाहते हैं।
  • चीन का प्रिय प्रोजेक्ट बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (Belt and Road Initiative/ BRI) और ब्रिक्स का रणनीतिक गठजोड़ पश्चिमी देशों का आर्थिक दबदबा खत्म कर सकता है।
  • गोल्डमैन सैक्श के मुताब़िक चीन 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका को पछाड़ देगा। ब्रिक्स के मौजूदा सदस्य देशों की बात करें तो चीन की अर्थव्यवस्था सभी देशों की अर्थव्यवस्था के लगभग दोगुनी बड़ी है। यही वजह है कि ब्रिक्स में इसका दबदबा बनता जा रहा है।
  • ब्रिक्स का विस्तार होता है तो चीन को अमेरिका के वर्चस्व वाले संगठन जी-7 से बड़ा मंच मिल जाएगा।
  • चीन इस मंच का इस्तेमाल अपने भू-राजनैतिक एजेंडे (Geo-political agenda) और विश्व व्यवस्था को लेकर अपने नजरिये को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहता है।
  • चीन खुद को अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी (competitor) के तौर पर देखता है, इसलिए वह विश्व व्यवस्था से अमेरिकी असर को कम करने की कोशिश कर रहा है। चीन को लगता है कि जिस तरह मौजूदा सदी अमेरिका की है उसी तरह अगली सदी उसकी होनी चाहिए।

ब्रिक्स के विस्तार को लेकर भारत को क्या आपत्ति है?

  • पाकिस्तान किसी भी तरह से ब्रिक्स का सदस्य बनना चाहता है, और चीन ने अपने इस ‘सदाबहार’ दोस्त के लिए पूरा जोर लगा रखा है। अगली बार जब ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन होगा तो पाकिस्तान को सदस्य बनाने का प्रस्ताव आएगा और संभवत: रूस में होने वाली बैठक में इसे मंजूरी मिल जाए। चीन पाकिस्तान को ब्रिक्स का सदस्य बनाने के लिए ग्लोबल साउथ का तर्क दे रहा है। लेकिन पाकिस्तान में जिस तरह की राजनीतिक और आर्थिक अव्यवस्था है, उसमें उसे सदस्य बनाने का कोई मतलब नहीं है। इससे ब्रिक्स का मूल मकसद ही कमजोर पड़ जाएगा।
  • ब्राजील में होने वाली अगली ब्रिक्स बैठक में साझा करेंसी का प्रस्ताव लाकर चीन की उसे पारित कराने की योजना है। ये भारत की चिंता बढ़ाने वाली है। भारत का मानना है कि साझा करेंसी की जगह हर देश की करेंसी को बढ़ावा मिले। दरअसल ब्रिक्स में शामिल सभी पांच देशों का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी चीन ही है। अगर साझा करेंसी में कारोबार होगा तो चीन का वजन बढ़ेगा और ये बात भारत के ख़िलाफ़ जाती है।

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